“मम्मा, मेरा शार्पनर खो गया है और स्टेंसिल भी टूट गई है. कल स्कूल के लिए प्रोजेक्ट बनाना है. मैं समीर (बदला हुआ नाम) के घर से लेकर अभी आ रही हूं.”
ये कहते हुए 12 साल की आन्या (बदला हुआ नाम) बिना मां का जवाब सुने, तुरंत बगल में रहने वाले समीर भाईजान के घर की ओर दौड़ पड़ी. समीर के घर का दरवाज़ा हमेशा की ही तरह खुला था, बाहर कोई घंटी भी नहीं थी.
आन्या और समीर का ये रिश्ता पिछले 12 साल से ऐसे ही चला आ रहा था, ना घरों के बीच कोई दीवार थी और ना ही दिलों में कोई दरार थी, लेकिन फ़रवरी के आख़िरी हफ़्ते में हुए दंगों के बाद ये तस्वीर बदल गई, रिश्ते बदल गए. दिल्ली में हुए दंगों ने दिलों में भी दूरियाँ पैदा कर दीं. उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगों के बाद आन्या और समीर के रिश्ते अब पहले जैसे नहीं रह गए हैं. जिन घरों के दरवाज़े पहले एक-दूसरे के लिए हमेशा खुले रहते थे, अब वहाँ ख़ामोशी है और आन्या चाहकर भी अपने समीर भाईजान के घर नहीं जा सकती, क्योंकि पड़ोस का वो मकान अब ख़ाली है, उस पर ताला लगा हुआ है. बाहर पड़ी समीर की साइकिल, जलकर राख हो चुकी है. इस साइकिल से आन्या की भी बहुत सी यादें जुड़ी हैं, ये यादें अब उसके दिल में दफ़न होकर रह जाएंगी.
तीन दशकों में दिल्ली ने ऐसी हिंसा नहीं देखी जो पिछले हफ़्ते उत्तर पूर्वी दिल्ली में देखी गई. हिंसा में अब तक 47 लोगों की मौत की बात सामने आई है. क्या बड़े, क्या बुज़ुर्ग, क्या हिंदू, क्या मुसलमान? दंगो ने ना जाति देखी ना धर्म, ना पुलिस वालों को छोड़ा न ख़ुफ़िया विभाग वालों को. जो सामने आया वही दंगों की आग में झुलस गया. दंगाइयों ने ना तो गर्भवती महिलाओं को बख़्शा, ना दुधमुँहे बच्चों को, जो भी दिखा, वो दंगाइयों की नफ़रत का शिकार हो गया.
कई लोग इसे सीएए के विरोध प्रदर्शन से जोड़ कर देख रहे हैं तो कई जाफ़राबाद में सीएए के ख़िलाफ़ प्रदर्शन पर बैठी महिलाओं को दंगों के लिए ज़िम्मेदार बता रहे हैं. कई कपिल मिश्रा के पुलिस के सामने दिए गए बयानों को दंगा भड़काने के लिए ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं. आम आदमी पार्टी ने इसे बीजेपी से जोड़ दिया और बीजेपी ने आम आदमी पार्टी के पार्षद ताहिर हुसैन पर आरोप लगाया. कई लोगों ने कांग्रेस की पूर्व पार्षद इशरत जहां पर भी आरोप लगाए.
इन आरोप-प्रत्यारोप के बीच जो बात सबसे अहम है वो ये कि आख़िर उत्तर पूर्वी दिल्ली में ये हिंसा देखते ही देखते कैसे फैल गई? क्या इलाक़े की डेमोग्राफ़ी के कारण ऐसा हुआ? क्या ये महज संयोग है या फिर ये एक तरह का नया प्रयोग है?
ये समझने के लिए हमें उत्तर पूर्वी दिल्ली के धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक ताने-बाने को बारीक़ी से समझने की ज़रूरत है.
जरूरत है समीर और आन्या के परिवारों की तरह वहां रहने वाले लाखों परिवारों को समझने की. उनके रहने के तौर तरीक़े, पढ़ाई-लिखाई, काम-काज को समझने की. ताकि हम ये समझ सकें कि दंगों से इन सब बातों से जोड़ना कितना सही है?
2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक़ उत्तर-पूर्वी दिल्ली में तकरीबन 22 लाख लोग रहते हैं. ज़ाहिर है ये 10 साल पुराना आंकड़ा है. उस लिहाज़ से इस इलाक़े की आबादी अब और भी ज़्यादा हो गई होगी. क्षेत्रफल के हिसाब से दिल्ली का ये हिस्सा 62 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है. यहां आबादी के घनत्व की बात करें तो 36155 लोग प्रति वर्ग किलोमीटर में रहते हैं. दिल्ली के औसत जनसंख्या घनत्व के मुक़ाबले ये अनुपात तीन गुना ज़्यादा है और मुंबई के मुक़ाबले ये दोगुना है.
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